Youth Issues. Mohandas Pai’s Game-Changing Ideas on Education, Employment and Public Policy.


नमस्ते ! एपिसोड का आनंद लेने के पहले कृपया मेरे चैनल की सदस्यता लें और साझा करें | मेरे साथ आज एक महत्वपूर्ण अतिथि हैं, बैंगलोर से सार्वजनिक बौद्धिक, मोहनदास पाई | नमस्ते मोहनदास जी ! नमस्ते ! – आपका यहाँ होना हर्ष की बात है ! – धन्यवाद ! – आपके साथ विचारों पर चर्चा करना बहुत अच्छा लगता है | मोहन एक सफल कॉर्पोरेट व्यक्तित्व रहे हैं | वे कई विषयों पर निर्भीक, मौलिक और साहसी विचारों वाले एक परोपकारी और सार्वजनिक बौद्धिक भी हैं | जैसे संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, भारतीयता, अर्थव्यवस्था, राजनीति आदि पर | यह एक बहुत ही जीवंत और रोचक चर्चा होने वाली है | मोहन ने कहा है कि उनसे कुछ भी पूछा जा सकता है और वे उसका उत्तर देंगे | वे बहुत फुर्तीले हैं | एक बात जिसपर हम भारत में बहुत गर्व करते हैं, वो है तथाकथित युवा लाभांश | पर यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम युवा लोगों को कैसे शिक्षित करते हैं | कई लोग किंडरगार्टन से 12 तक की विद्यालयी शिक्षा प्रणाली की आलोचना करते हैं | यहां तक कि उच्च शिक्षा में भी हम दुनिया के शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में से एक नहीं हैं | आपको क्या लगता है कि इसके पीछे का कारण क्या है ? राजीव मुझे पहले आंकड़े देने दें | बहुत से लोग भारतीय शिक्षा प्रणाली की आलोचना करते हैं, परन्तु उन्होंने उस व्यापकता को नहीं सम्हाला है जो हम सम्हालते हैं | हमारे पास 26.5 करोड़ विद्यालयी बच्चे हैं, जितने चीन सहित किसी देश में नहीं है | अमेरिका और यूरोप में इतने नहीं हैं | – यूरोप में इतने सारे लोग नहीं हैं | – बिलकुल | हमारे यहाँ 800 विश्वविद्यालय, 51,000 महाविद्यालय, 3.5 करोड़ कॉलेज के विद्यार्थी हैं | सकल नामांकन दर 24 है यानी 18-23 वर्ष के 24% लोग कॉलेज जाते हैं | विकास दर 3.5% है और यह 7 करोड़ तक चला जायेगा | 3.5 करोड़ के साथ हम संभवतः विश्व का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय तंत्र हैं और हम चीन को पछाड़ देंगे यदि अभी तक नहीं पछाड़ा है तो | प्रत्येक वर्ष 80 लाख युवा स्नातक होते हैं | कोई देश इस पैमाने पर नहीं करता है | 80 लाख स्नातक – भारत से हर साल 80 लाख स्नातक – बहुत प्रभावशाली – और भारी वृद्धि के साथ | यह सब हमें समझना चाहिए | जब तक कि कोई भारत जैसे विशाल तंत्र का प्रबंधन नहीं करता और परिणाम नहीं देता है, तब तक हमें उनकी आलोचना से चिंतित नहीं होना चाहिए | पर हमें गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा | सबको शिक्षित करने के क्रम में व्यापकता पर ध्यान केन्द्रित करने के कारण गुणवत्ता पीछे छूट गयी है | विश्व रैंकिंग प्रणाली में, शीर्ष 100 या 200 विश्वविद्यालय मुख्य रूप से यूरोप, अमेरिका या चीन से हैं | रैंकिंग पद्धति अनुसंधान को सबसे अधिक महत्व देता है जिसके बाद बाह्य-संपर्क है | अनुसंधान आधारित विश्वविद्यालयों का वित्तपोषण सार्वजनिक स्रोतों या निजी अनुदानों द्वारा किया जाता है | परन्तु भारत की शिक्षा प्रणाली एक शिक्षण आधारित शिक्षा प्रणाली है, जो शोध पर केंद्रित नहीं है | हमारे पास वित्तपोषण के बड़े सार्वजनिक स्रोत नहीं हैं | संभवतः 50-60 संस्थान अनुसंधान करते हैं | स्वतंत्रता के बाद नेहरु ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बहुत बड़ी भूल की | विश्वविद्यालयों से पृथक रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) एवं वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) बनाकर | काफी सारा धन रक्षा व प्रायौगिक अनुसन्धान में व्यय होता है | इन दो संस्थानों में लगभग 15 हजार करोड़ प्रति वर्ष | शोध विश्वविद्यालय प्रणाली तक नहीं पहुंचता है | ये पृथक-पृथक हैं, उनके पास फैलोशिप (छात्रवृत्ति) नहीं है या छात्रों को अनुसंधान के लिए आने की अनुमति नहीं है | अभी भी, जब सीएसआईआर ने प्रति वर्ष 1000 पीएचडी लेना आरम्भ कर दिया है और अपने आप में विश्वविद्यालय बनने की चेष्टा कर रहा है | जब तक कि अनुसंधान के लिए सार्वजनिक धन उपलब्ध नहीं होगा और ये प्रयोगशालाएं विश्वविद्यालयों से पंक्तिबद्ध नहीं होंगी, हम शीर्ष 100 या 200 में नहीं होंगे | अगला विषय यह है कि लोगों ने अनुदान देना आरम्भ नहीं किया है क्योंकि अधिकाँश सरकारी विश्वविद्यालय हैं, फिर भी हाल के वर्षों में कुछ निजी विश्वविद्यालय उभरकर आये हैं | सरकारी विश्वविद्यालय निजी क्षेत्र से भागीदारी नहीं करते हैं | उनकी विपणन (मार्केटिंग) क्षमता तुच्छ है और वे सरकारी अनुदान पर आश्रित हैं | उन्हें मनोदृष्टि की समस्या है | वे अपने पूर्वक्षात्रों को नहीं जोड़ते हैं | उनके बोर्ड में कोई पूर्वक्षात्र नहीं है | सरकार अब इसे सुलझाने का प्रयास कर रही है | तो ये दो मौलिक मुद्दे हैं | शिक्षण के दृष्टिकोण से शीर्ष 25% विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता बहुत अच्छी है | उदाहरण के लिए 1.86 लाख भारतीय अमेरिका में पढ़ रहे हैं | उनमें से 60% कुछ शीर्ष विश्वविद्यालयों से परास्नातक या पीएचडी कर रहे हैं | कंप्यूटर साइंस में परास्नातक और पीएचडी के 60% छात्र एशियाई हैं, जिनमें से अधिकांश भारतीय हैं | 4 लाख भारतीय छात्र सभी विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं | अमेरिका में हम चीन के बाद दूसरे सबसे बड़े जातीय समूह हैं जो अध्ययन के लिए आते हैं | यदि हमारे छात्रों को भारत में वास्तव में अच्छी तरह से पढ़ाया नहीं गया तो हमारे छात्र शीर्ष अमेरिकी विश्वविद्यालयों में कैसे आए ? महत्वपूर्ण बात है | पहला विषय व्यापकता और मात्रा है | स्वतंत्रता के बाद हमें वि-उपनिवेशीकृत होना था और इसलिए बड़ी संख्या में लोगों को शिक्षित करना था | गुणवत्ता का पतन हुआ, मुख्य रूप से इसलिए क्योंकि नेहरू ने शिक्षण से अनुसंधान को पृथक कर दिया | अमेरिका में यह एकीकृत है, इसलिए युवा लोग शोध कर सकते हैं | शोध कार्यक्रमों में प्रशिक्षित करने के लिए युवाओं की एक श्रृंखला हो सकती है | शिक्षण और शोध को पृथक करना एक बड़ी भूल थी | आशा है कि वे उन्हें एकीकृत करेंगे | मुझे विश्वास नहीं है | वे मुक्ति से परे स्वयं में लीन द्वीपों के सामान हैं | संभवतः कुछ होगा | एक और विषय है कि नेहरू ने व्यापक प्राथमिक शिक्षा सुनिश्चित नहीं किया था | आज भारत और चीन की साक्षरता दर क्रमश: 75-77% और 96% है | जब 1949 में माओ सत्ता में आए तो उन्होंने कहा: “महिलाएं स्वर्ग के अर्धभाग की स्वामिनी हैं” | उन्होंने महिलाओं को शिक्षा प्रदान किया | आज चीन में 65% महिलाएं श्रमिक हैं जबकि भारत में वे 25% हैं | इसलिए हमारी महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम शिक्षित हैं | उनके पास अधिक बच्चे हैं और आबादी बढ़ी है | यदि नेहरू ने स्वतंत्रता के बाद महिलाओं के लिए प्राथमिक शिक्षा सुनिश्चित की होती तो हम एक भिन्न देश होते | हमारी जनसंख्या छोटी होती और लोग अधिक सशक्त | हमारे यहाँ कम गरीबी होती | हम पहले दशक में प्राथमिक शिक्षा सुनिश्चित न करने की नेहरू की भूल का भुगतान कर रहे हैं | और कमांड-नियंत्रण अर्थव्यवस्था में विश्वास के कारण निजी क्षेत्र को आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी गयी | अंग्रेजों के आने से पहले हमारे यहाँ एक बहुत अच्छी शिक्षा प्रणाली थी | मैकॉले के पत्र प्रमाण हैं | आज एक हिन्दू होने के नाते मैं एक विद्यालय आरम्भ नहीं कर सकता हूँ | केवल अल्पसंख्यकों को विद्यालय आरम्भ करने का विशेषाधिकार है | हिन्दू के रूप में मैं बहुसंख्यक माना जाता हूँ और सरकारी भेदभाव का सामना करता हूँ | अनुच्छेद 29 और 30 के अंतर्गत अल्पसंख्यक, भाषाई अल्पसंख्यक भी, विद्यालय खोल सकते हैं | एक भाषाई अल्पसंख्यक के रूप में मैं बिना किसी कष्ट के विद्यालय खोल सकता हूँ | परन्तु एक हिंदू के रूप में, 79% आबादी होने के कारण, सरकार आपको सताएगी क्योंकि वे केवल सरकारी विद्यालय चाहते हैं | कुछ निजी विद्यालय हैं, जो विभिन्न कारणों से आए हैं | लेकिन स्वतंत्रता के पहले 1 या 2 दशकों में, हमारे परोपकारी लोग कई विद्यालय खोल सकते थे | यह हास्यास्पद नेहरूवाद है जो चुनिंदा रूप से समुदाय के आधार पर विद्यालयों को अनुमति देता है, वो भी ऐसे देश में जहां शिक्षा की बहुत आवश्यकता है | यदि पर्याप्त मांग है और लोग अध्ययन करना चाहते हैं, तो सभी को विद्यालय खोलने में सक्षम होना चाहिए | प्रमुख सुधारों की आवश्यकता है | चलिए मैं आपसे पूछता हूँ | अमेरिका में एक अच्छी बात यह है कि बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के कई निजी अनुदानों पर आधारित पीठ व कार्यक्रम हो सकते हैं | कोई किसी विश्वविद्यालय में जा सकता है, बातचीत करके पीठ स्थापित कर सकता है | भारत में इंफोसिस की तरह किसी कंपनी के लिए क्या यह संभव है कि इंफोसिस पीठ स्थापित करे और छात्रों को प्रशिक्षित कराए ? यह संभव है और इंफोसिस ने ऐसा किया है | पर इसे बड़े स्तर पर करने की आवश्यकता | लेकिन राजीव कृपया समझें कि अमेरिका में पूर्वछात्र पीठों के लिए धन देते हैं | यहां पूर्वछात्रों से पीठों की वित्तपोषण के लिए संकाय को उनसे बातचीत करनी चाहिए और विपणन करना चाहिए | उन्हें पूर्वछात्रों को जोड़ना चाहिए और उन्हें बोर्ड में आने के लिए आमंत्रित करना चाहिए | लेकिन आईआईटी व अन्य इस प्रकार पूर्वछात्रों के साथ बातचीत नहीं करते हैं | आईआईटी चेन्नई में एक सक्रिय पूर्वछात्र कार्यक्रम है और झुनझुनवाला जैसे लोग उत्कृष्ट काम करते हैं और उन्हें बड़ी धनराशि मिलती है | यदि सभी आईआईटी व सरकारी विश्वविद्यालय ऐसा करें तो यह बहुत अच्छा होगा | आईआईएससी बहुत कुछ कर सकता है लेकिन वे बाजार समझदार नहीं हैं | संकाय लोगों तक पहुंचना नहीं चाहता है | जब मैं इंफोसिस में एचआर और शिक्षण शोध का प्रमुख था, तो हमें पीठों के लिए भारतीय विश्वविद्यालयों द्वारा बिरला ही कभी संपर्क किया गया था | जबकि कैम्ब्रिज, अमेरिकी और यूरोपीय विश्वविद्यालय प्रत्येक वर्ष आए थे | परन्तु 15 साल में आईआईएससी केवल दो बार आया | यानी विपणन एक बड़ी निर्बलता है और उन्हें अपने विश्वविद्यालयों से लगाव रखने वाले पूर्वछात्रों के साथ बातचीत करनी है | यह एक छोटे स्तर पर हो रहा है परन्तु इसे बढ़ाना चाहिए | अमेरिका में, चूंकि वे सरकारी अधिकारी नहीं हैं, इसलिए उन्हें विश्वविद्यालयों द्वारा बाहर निकलने और विपणन करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है | इसलिए वे पूर्वछात्रों के साथ बातचीत करते रहते हैं और धन इकठ्ठा करते रहते हैं | भारत में धन सरकार से आता है और वे जानते हैं कि उनकी नौकरियां सुरक्षित हैं और उनके पास आजीवन रोजगार है | यहां यह एक मनोदृष्टि की समस्या है | सार्वजनिक क्षेत्र के रूप में, वे निजी क्षेत्र से बहुत अधिक घृणा करते हैं | निजी क्षेत्र बुरा है, वे पैसा और लाभ कमाते हैं | आर्थिक-कल्याण और समृद्धि के लिए विशिष्ट नेहरूवादी घृणा | परन्तु उनमें से कुछ बाहर आ रहे हैं और मुझे आशा है कि यह बढ़े | सबसे अच्छा मार्ग है कि उन्हें अमेरिका की भांति 12 महीनों के स्थान पर 10 महीने का वेतन दिया जाए | उन 2 महीनों में उन्हें बाहर पहुंचना है | फिर विश्वविद्यालय बाह्य पहुँच बनाने पर ध्यान दें | हमें केंद्र-बिंदु बदलना है, सरकारी चंगुल से विश्वविद्यालयों को हटाना है और उन्हें स्वायत्त बनाना है | सरकार निर्देशित और नियंत्रित करती है | किसी भी उच्च शिक्षा प्रणाली में, सरकार की 3 भूमिकाएं हैं: नीति निर्माता, नियामक और सेवा-प्रदाता | हमारी सरकार किसी का पालन नहीं करती है | संस्थानों को किसी भी उत्तरदायित्व से बचाने के लिए नीतियां बनाई जाती हैं | नीतियां देश या छात्रों के लिए नहीं हैं | एक नियामक के रूप में वे निजी क्षेत्र के विरुद्ध भेदभाव करते हैं | यूजीसी और एआईसीटीई सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों की भांति निजी संस्थानों को पैसे नहीं देते हैं | निजी क्षेत्रों में बहुत से नियम और विनियम का सामना करना पड़ता है | परन्तु यदि किसी सरकारी विश्वविद्यालय से गड़बड़ हो जाता है, तो कोई कार्रवाई नहीं की जाती है | पर वे निजी क्षेत्र के पीछे पड़ जाते हैं और अनावश्यक विनियम जारी करते हैं | शिक्षा प्रदाता के रूप में सरकारी विद्यालय दोषपूर्ण हैं | लगभग 25% अच्छे हैं, 25% औसत और 50% दोषपूर्ण हैं | लेकिन शिक्षकों या किसी के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की जाती है, और हमारे बच्चों को सरकारी विद्यालयों में दोषपूर्ण शिक्षा मिलती है | निजी विद्यालय और कॉलेज शुल्क आधारित हैं, और शिक्षा की गुणवत्ता के आधार पर लोग तय करते हैं कि नामांकन कराना है या नहीं | सरकारी विश्वविद्यालयों में, यहां तक कि जब कोई शून्य अंक लाता है तो कुछ नहीं होता है | शिक्षकों को वेतन और पेंशन मिलता रहता है | कोई कार्रवाई नहीं की जाती है | निजी क्षेत्र के विपरीत, सेवा प्रदाता के रूप में सरकार को उत्तरदायी नहीं माना जाता है | जैसे-तैसे भारत एक सरकारी देश बन गया है जहां हम उनके द्वारा नियंत्रित और निर्देशित हैं जो उत्तरदायित्व से परे हैं | सही कहा | सरकारी मध्यमता | सरकारी मध्यमता और निजी क्षेत्र के लिए सरकारी घृणा | मैं दिल्ली में था और वे मुझे बता रहे थे “ओह उस हलवाई ने विश्वविद्यालय शुरू किया” | एक हलवाई ने एक विश्वविद्यालय खोला है जिसमें 65,000 लोग स्वेच्छा से आते हैं और शुल्क का भुगतान करते हैं | स्वाभाविक है कि वे लाभ देख रहे हैं | उन्हें अच्छी शिक्षा मिल रही है, लेकिन नीति निर्माता इसे स्थापित करने वाले हलवाई का उपहास कर रहे हैं | तो क्या त्रुटी हुई ? वह एक चालाक व्यक्ति है | मुझे गर्व है कि हमारे यहाँ एक साधारण व्यक्ति, जो एक दरिद्र परिवार में जन्मा, और रेलवे स्टेशन पर चाय बेचता था, हमारे देश के प्रधान मंत्री के रूप में निर्वाचित है | इसके स्थान पर कि वो नई दिल्ली में विशेषाधिकार के साथ जन्म लेता और करदाताओं के पैसे पर पलता | हमारा देश एक योग्यतातंत्र है लेकिन हमारी उच्च शिक्षा के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है | ये कुछ बहुत अच्छे मुद्दे हैं | एक विषय जिसपर हमने बात की वो है भारत की बड़ी आबादी, यानी तथाकथित जनसांख्यिकीय लाभांश | हमारी एक युवा जनसँख्या है | हमें संभावित जनसंख्या बम के विरुद्ध उसे संतुलित करने की आवश्यकता है | माना जाता है कि 2 करोड़ लोग प्रति वर्ष आजीविका बाजार की आयु तक पहुंच रहे हैं, परन्तु उतनी नौकरियां सृजित नहीं हो रही हैं | तो क्या हम जनसंख्या आपदा की ओर बढ़ रहे हैं ? हम अधिक से अधिक लोगों को जोड़ रहे हैं लेकिन स्वाभाविक है कि हमारे पास अधिक से अधिक भूमि या भोजन नहीं हो सकता है | आप इसके बारे में क्या सोचते है ? राजीव, मैं आपको फिर से आंकड़ा देता हूँ | हमारी जनसंख्या लगभग 1.3 अरब है जो प्रति वर्ष 1.2-1.3% के दर से बढ़ रही है | भारत का प्रजनन दर 2.3 है, प्रतिस्थापन दर 2.1 है | पूरे दक्षिण महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, केरल और कर्नाटक में प्रजनन दर केवल 1.7 है | पश्चिम बंगाल में 1.6 है, पंजाब में 1.6 है | बिहार में 3.2, यूपी में 2.8, राजस्थान में 2.4, मध्य प्रदेश में 2.4 है | 1971 में दक्षिण, भारत का 30% था | 2011 में यह घटकर 25% हो गया है | यानी उत्तर-दक्षिण वितरण में समस्या है | दक्षिण अधिक सफलता, कम जनसंख्या वृद्धि, और कम प्रतिस्थापन दर के साथ तीव्र गति से बूढ़ा हो रहा है | वे श्रेष्ठतर रूप से शिक्षित और शासित हैं, और इसलिए दक्षिण में वृद्धि अधिक है | फिर गंगा के गौ-पट्टी (कॉव बेल्ट) में प्रशासनिक मुद्दे हैं | यहां तक कि पश्चिम बंगाल में प्रजनन दर नीचे आया है | 5-7 वर्षों में हमारी प्रजनन दर प्रतिस्थापन दर के बराबर होगी | क्या यह शिक्षा या आय या महिलाओं से संबंधित है ? यह शिक्षा और आय से संबंधित है, क्योंकि एक बार जब आप महिलाओं को शिक्षित करते हैं तो उनके पास इतने सारे बच्चे नहीं होते हैं | आइए आंकड़ों को देखें | एक अशिक्षित महिला के पास 5-6 बच्चे हैं, अर्द्ध शिक्षित महिला के 3-4, एक मैट्रिकुलेट महिला के 2-3 और एक उच्च शिक्षित महिला के पास केवल 1 बच्चा है | आंकड़े स्पष्ट रूप से इंगित करते हैं कि जब महिलाएं सशक्त और शिक्षित होती हैं, तब वे कम बच्चे चाहती हैं | आज एक बच्चे को पालना महंगा है | जन्म से जब तक बच्चे को डिग्री और नौकरी मिलती है तब तक 1 करोड़ रुपये खर्च हो जाता है | यह एक बड़ा निवेश है | कई महिलाओं को अवचेतन रूप से यह पता है कि वे एक और बच्चे को जन्म नहीं देना चाहते हैं, और इतना सारा धन और समय का व्यय | यानी कम बच्चों का होना आर्थिक विकास को बढ़ावा दे रहा है | महिला शिक्षा अल्पसंख्यकों की भी सहायता करता है जिनके पास बड़े परिवार हैं और वे 10 वर्ष पीछे हैं | असंगत आंकड़ों के अनुसार एससी, एसटी और अल्पसंख्यक बच्चों की संख्या के मामले में 10 वर्ष पीछे हैं | यानी महत्वपूर्ण कारक महिलाओं की शिक्षा और विवाह देर से सुनिश्चित करना है | भारत के लिए एक महान दीर्घकालिक निवेश | – सर्वश्रेष्ठ दीर्घकालिक शिक्षा महिलाओं को संभवतः परास्नातक तक शिक्षित करना है ताकि वे देर से विवाह कर सकें | इस प्रकार हम अपने देश का पुनर्निर्माण कर सकते हैं | आजादी के पहले दशक में नेहरू की भूल थी जन शिक्षा प्रदान नहीं करना और विशेष रूप से माओ की भांति महिलाओं की शिक्षा | माओ ने कहा, “महिलाएं स्वर्ग के अर्धभाग की स्वामिनी हैं” | आज चीन 8.5 लाख अरब रुपयों (12.5 ट्रिलियन अमरीकी डालर) की अर्थव्यवस्था है | कारण पता करने और भारत को श्रेष्ठतर बनाने के लिए परिवर्तित करने में अभी बहुत विलम्ब नहीं हुआ है | मैं वास्तव में भारत के तथाकथित जनसांख्यिकीय लाभांश के बारे में चिंतित हूँ | भारत पिछले 30 वर्षों से प्रति वर्ष 2.5 करोड़ बच्चों को जन्म दे रहा है | इसकी गणना हमारे जनगणना के आंकड़ों से की जा सकती है जो प्रत्येक दशक में प्रकाशित होती है | हमारे पास 1971 से 2011 तक का दशकीय आंकड़ा है | अनुमान लगाने के लिए, हम आरम्भ और समापन संतुलन का औसत लेते हैं और मृत्यु दर जोड़ने पर 2.5 करोड़ के आंकड़े तक पहुंचते हैं | 10 लाख शिशु 5 की उम्र पहुंचने से पहले मर जाते हैं क्योंकि शिशु मृत्यु दर प्रति वर्ष 45/1000 है | यानी 2.4 करोड़ प्रति वर्ष 21 की उम्र प्राप्त करते हैं और अगले 20 वर्षों तक ऐसा करेंगे | उनमें से 30% नौकरियां नहीं चाहते हैं और विवाह कर लेते हैं या कृषि में लग जाते हैं | कृषि भारत की कार्यशील जनसँख्या का 45% है | हमें प्रति वर्ष लगभग 1.7 करोड़ नौकरियों की आवश्यकता है, लेकिन सरकारी आंकड़ों के अनुसार केवल 60-70 लाख उत्पन्नं हो रही हैं | मैं इसके लिए एक रिपोर्ट पर काम कर रहा हूँ | इसलिए पिछले एक दशक में प्रति वर्ष 1 करोड़ लोगों को अच्छी नौकरियां नहीं मिली हैं, और संभवतः 2000-3000 रुपये की नौकरी मिली हैं | अच्छी नौकरी का अर्थ है 10,000 रुपये या उससे अधिक की | उनमें से आधे या 3/4 शिक्षित हैं | अगले दशक के लिए हमारे पास उसी प्रकार 1 करोड़ लोग होने जा रहे हैं, क्योंकि अधिक से अधिक नौकरियां स्वचालित होने जा रही हैं | 2025 तक, 21 से 45 वर्ष के आयु वर्ग के 20 करोड़ शिक्षित लोगों के पास नौकरियां नहीं होंगी क्योंकि अर्थव्यवस्था उनको सम्हाल नहीं सकती है | यह एक डूबी हुई पीढ़ी है और हम एक जनसांख्यिकीय आपदा के मध्य में हैं न कि जनसांख्यिकीय लाभांश के | और ये वही है जिसे आप देख रहे हैं राजीव | गुज्जर, जाट और पटीदार आंदोलन, तमिल और जल्लीकट्टू की समस्या, मराठा समस्या सभी इसलिए हैं क्योंकि ये लोग नौकरियां चाहते हैं जो अस्तित्व में नहीं हैं | और शिक्षा कम गुणवत्ता वाली है | लेकिन वे उच्च आकांक्षाओं वाले साक्षर लोग हैं जिनके पास या तो नौकरी नहीं है या कम वेतन वाली नौकरियां हैं | दिल्लीवाला के रूप में, मेरा अवलोकन यह है कि दिल्ली के बहुत-से अपराध के लिए हरियाणा व आसपास के क्षेत्रों के युवाओं को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है | जो कि बेरोजगार युवा हैं | वे प्रायः मदिरा में उन्मत्त रहते हैं और आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहते हैं | हमारे राजनेता उभर रहे जनसांख्यिकीय आपदा को नहीं पहचानते हैं और इसे जनसांख्यिकीय लाभांश कहते हैं | दक्षिण में यह बहुत कम है | दक्षिण में प्रजनन दर नीचे आ गई है | शिक्षा श्रेष्ठतर है, एक बड़े सेवा उद्योग के कारण आर्थिक विकास अधिक है | उत्तर या मध्य भारत में, ऐसी सेवा उद्योग आधारित नौकरियां नगण्य हैं | तुच्छ मौलिक ढांचा और शासन प्रणाली बड़ी चुनौती हैं | सरकार ऐसी किसी बात को अस्वीकार करती है क्योंकि यदि वे स्वीकारेंगे तो उन्हें इसका हल करना होगा | समस्या यह है कि सरकार आंकड़े नहीं देखती है | मैंने किसी भी पदाधिकारी के बारे में नहीं सुना है जो आंकड़ों के आधार पर निर्णय लेते हों | 4 वर्ष पहले मैंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को औपचारिक रोजगार के आंकड़ों को देखने के लिए लिखा क्योंकि यह रोजगार-शून्य विकास को दर्शाता था | 1991 से 2014 तक भारत मौद्रिक रूप से 8.8% के दर से बढ़ा | 18 हजार अरब रुपये से 1.5 लाख अरब रुपये, 8.8% के सीएजीआर से | विकास की इस दर पर, नौकरियों को कम से कम 2-3% तक बढ़ना चाहिए था | 2-3% नौकरियों की वृद्धि होनी ही चाहिए, क्योंकि रोजगार-शून्य विकास असंभव है | सरकार सहित औपचारिक क्षेत्र में वेतनपंजी (पेरोल) पर 10 करोड़ लोग हैं | सरकार विश्लेषण के लिए डेटा नहीं देखती है | वो यह पता करने का प्रयास नहीं करती कि कितनी नौकरियां भूस्वामित्व के कारण आईं, जिलावार आंतरिक प्रवासन की प्रवृत्ति, शिक्षा का स्वरूप और माध्यम, आजीविका सृजन की प्रवृत्ति, उनकी संख्या और नौकरी के लिए कौशल की आवश्यकताएं क्या हैं | वे सामान्यतः अनुमान का सहारा लेते हैं | तो क्या मीडिया इस बारे में जागरूकता फैलाने का अच्छा काम कर रहा है ? नहीं, मीडिया विषयों को उत्तेजक बनाने के लिए अधिक चिंतित है | वे प्रतुत करेंगे कि मोहन भागवत कह रहे हैं कि मुस्लिम सहित सभी भारतीय हिंदू हैं | और फिर अराजकता होगी | कोई भी स्वतंत्र नागरिक के रूप में क्या कहता है यह हमारे लिए अप्रासंगिक है | हमारे लिए अधिक महत्वपूर्ण है हमारे बच्चों का भविष्य | क्या सरकार आवश्यक सेवा प्रदान कर रही है ? क्या शुचितापूर्ण करदाताओं को पुरस्कृत किया जा रहा है ? ये महत्वपूर्ण प्रशासनिक विषय हैं जो सभी को प्रभावित करते हैं | वे हमारे बच्चों के वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करते हैं | दिल्ली में इतना ट्रैफिक जाम क्यों है ? दिल्ली की हवा इतनी प्रदूषित है कि लोगों का जीवन 9 वर्ष तक कम हो गया है | क्या आप यह जानते थे ? – हां – लोगों का जीवन 9 वर्ष कम है और यूनिसेफ के अनुसार दिल्ली में बढ़ रहे बच्चे को मस्तिष्क के विकास की समस्या झेलेगा | क्या हम दिल्ली में मूर्खों की एक पीढ़ी तैयार रहे हैं ? और अन्य प्रदूषित स्थानों पर भी | मैं हमारे बच्चों के बारे में चिंतित हूँ – ये गंभीर विषय हैं – हमारे राजनेताओं को इनके बारे में चिंतित होना चाहिए | इसके स्थान पर वे अनुपयोगी बहस, क्षमा-प्रार्थना की मांग और संसद को बंद करने में उलझे हैं | मैं इन लोगों को नहीं समझ पाता हूँ | यह महत्वपूर्ण है कि लोग तथाकथित जनसांख्यिकीय लाभांश के बारे में बात करना बंद करें और वास्तविक विषयों पर ध्यान केंद्रित करें जैसे नौकरी, स्वास्थ्य, प्रदूषण नियंत्रण, जीवन की गुणवत्ता में सुधार, विश्व-स्तर पर प्रतिस्पर्धा व वैश्विक स्तर की गुणवत्ता के लिए युवाओं को मंच प्रदान करना | मुझे नहीं लगता कि हमारे राजनेता ऐसा कर रहे हैं | वे इसे संबोधित नहीं करना चाहते हैं क्योंकि तब उन्हें ठोस कार्रवाई करनी होगी जो वे नहीं करना चाहते हैं | चूंकि उनके पास समाधान नहीं हैं इसलिए वे अल्पकालिक सुधारों को देख रहे हैं | लेकिन राजीव आप देखिये, इस सरकार ने बहुत सारा काम किया है और हमें इसे स्वीकार करना चाहिए | बहस नागरिक समाज में होनी चाहिए | सभी नागरिकों को ऐसे विषयों पर सोचना चाहिए | अब एक विचित्र विषय देखें | इस देश के सुदूर कोने मुजफ्फरनगर में एक व्यक्ति की सामूहिक हत्या हो जाती है | कोई नहीं जानता कि यह कहां है | यह एक अपराध है और अपराधियों को तदनुसार दंडित किया जाना चाहिए | अचानक से लुटियन्स दिल्ली से चीख आती है कि हम असहिष्णु हो गए हैं | मैं भारत के दक्षिण में बैंगलोर में रहता हूँ, मैं असहिष्णु कैसे बन गया ? मेरा राज्य कर्नाटक कांग्रेस के अधीन है, एक महिला पत्रकार को गोली मार दी गई | हमें नागरिक सुरक्षा के बारे में चिंतित होना चाहिए और अपराधियों को दंडित किया जाना चाहिए | परन्तु यह एक दक्षिणपंथियों को दोषी ठहराने वाली एक वैचारिक लड़ाई बन गयी | एक सुप्रसिद्ध इतिहासकार ने बिना किसी प्रमाण के पहले ही निर्णय ले लिया कि स्पष्ट रूप से हत्यारा कौन था | एक बड़ी जनयात्रा निकली | लेकिन अभी भी हत्यारे परे हैं और कोई कार्यवाही नहीं हुई है | तथाकथित बौद्धिक कपटी हैं और वास्तविक मुद्दों पर बहस नहीं की जा रही है | वे वैचारिक दृष्टि अपनाते हैं | वास्तविक विषय जैसे युवाओं के लिए नौकरियां, जीवन की गुणवत्ता में सुधार, शुचिता, सत्यनिष्ठा, और न्याय के प्रतिपादन जैसी वास्तविक समस्याएं बनी रहती हैं | हमारे देश में न्याय-व्यवस्था दोषपूर्ण है जहां अभियोगों में 15-20 वर्ष लगते हैं और दरिद्र लोगों को जेलों में रखा जाता है | मैंने एक रिपोर्ट पर अमनेस्टी के साथ काम किया था जो दर्शाता है कि जेलों में सुनवाई के प्रक्रियाधीन 50-60% लोगों ने वो अवधि पूरा कर लिया है जिस अवधि के लिए उन्हें जेल में डाला गया है | और कोई भी न्याय की चिंता नहीं करता है | पर कहीं एक हत्या हो जाती है और अचानक से हम तथाकथित रूप से असहिष्णु हो जाते हैं | लोग पुरस्कार लौटाने और भारत की निंदा करने लगते हैं | भारतीय मूल के अर्थशास्त्री विषयों को निकटता से देखे बिना ही भारत के बारे में अर्थहीन बातें लिखते और ट्वीट करते हैं | नागरिक के रूप में हमें अपने कार्यों को साथ मिलकर करना होगा | हमें यह परिभाषित करना होगा कि हमारे देश के लिए महत्वपूर्ण विषय क्या हैं | जैसे जीवन की गुणवत्ता में सुधार, एक अर्थव्यवस्था जो युवाओं के लिए पर्याप्त नौकरियों का सृजन करे, एक सुरक्षित समाज जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है और सभी को मूलभूत सुविधायें प्रदान करता है | आपकी विचारधारा भिन्न हो सकती है परंतु इस तरह के बड़े विषयों से अधिक वरीयता नहीं रखती है | एक समाज जहां संपत्ति, जीवन और स्वतंत्रता सुरक्षित है और कानून का राज है | हमें अवश्य इसकी मांग करनी चाहिए | एक वैचारिक लड़ाई इस तरह के बड़े विषयों के स्थान पर व्यक्तिगत दोषारोपण पर ध्यान केंद्रित करती है | मुझे लगता है कि मीडिया एक बड़ी समस्या है | विवेक की अभिव्यक्ति के रूप में उन्हें जनता को सूचित रखना चाहिए | इसके स्थान पर वे अप्रासंगित विषयों और महत्वहीन प्रसंगों को उत्तेजक बनाते हैं और प्रमुख सामाजिक समस्याओं की उपेक्षा करते हैं | इस तरह के विश्लेषण के लिए गहन अध्ययन व अनुसंधानिक पत्रकारिता की आवश्यकता होती है और इसे शीघ्रता से नहीं किया जा सकता है | यानी मीडिया को अनुसंधानिक पत्रकारिता में निवेश करने की आवश्यकता है | साथ-ही लोगों को यह भी समझना चाहिए कि भारत जैसा कोई देश नहीं है | 130 करोड़ लोग, 29 राज्य, प्रत्येक राज्य संभवतः यूरोपीय देशों से बड़ा और लगभग स्वतंत्र देश की तरह है | जिस रूप में आप देखते हैं, उस रूप में यह एक देश नहीं है | – यूपी अकेला 22 करोड़, इंग्लैंड, फ्रांस और जर्मनी मिलाकर है | वहां होने वाली कोई घटना पूरे देश को प्रभावित नहीं करती है, इसलिए उसके आधार पर सामान्यीकरण भ्रामक है | भारत बहुत बड़ा देश है और हमारा समाज बहुत जटिल है | हमें सही मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए और भारत की भर्त्सना नहीं करनी चाहिए | हमें भारत की पहचान को क्षति नहीं पहुँचाना चाहिए न्यूयॉर्क टाइम्स या वाशिंगटन पोस्ट में लोगों की दोषपूर्ण छवि दिखाकर और भारत के बारे में नकारात्मक बातें लिखकर | नकारात्मक धारणा बनाने के स्थान पर सही विषयों पर बहस करने और समाधान ढूंढने पर ध्यान केंद्रित होना चाहिए | यह हमारे बच्चों और देश के प्रति देय (ऋण) है | बड़ी बात | अब मेरे पास आईआईटी और अन्य तकनीकी संस्थानों से जुड़ा एक प्रश्न है | पहले हम रैंकिंग के बारे में बात कर रहे थे | इन संस्थानों में स्टार्टअप के लिए इनक्यूबेटर की अनुमती देना अमेरिका की एक अच्छी बात है | स्टैनफोर्ड, एमआईटी आदि में ऐसे इनक्यूबेटर हैं | क्या आपको लगता है कि भारत में यह पर्याप्त स्तर तक हो रहा है ? यह आईआईटी चेन्नई में हो रहा है | जब आप कल स्वदेशी इंडोलॉजी सम्मेलन में जायेंगे, तो आप झुनझुनवाला का उत्कृष्ट इनक्यूबेटर देखेंगे जिसमें 250 कंपनियां हैं | मुंबई और दिल्ली में भी | मैं आईआईटी की स्वायत्तता के लिए सरकार द्वारा गठित करपुकर कमिटी का सदस्य था और हमने आईआईटी जैसे 100 संस्थानों का अनुमोदन किया था | अनुमान के अनुरूप कई आईआईटी निदेशकों ने कहा कि गुणवत्ता का ह्रास होगा | उनका मानना है कि गुणवत्ता को नियंत्रित करने के लिए आपूर्ति को निचोड़ना अच्छा है | कोई अन्य देश ऐसा नहीं करता है | 130 करोड़ के राष्ट्र के रूप में, हमें अपने देश को बढ़ाने के लिए आईआईटी चेन्नई जैसे 100 संस्थानों की आवश्यकता है | यदि 100 ऐसे संस्थान 1000 छात्र लेते हैं, तो हमारे पास प्रत्येक वर्ष 1 लाख उच्च गुणवत्ता वाले इंजीनियर होंगे | – बिलकुल ! हमें उनकी आवश्यकता है | उन्होंने कहा कि पर्याप्त संकाय नहीं है | यदि आवश्यक हो तो हम विदेशी संकाय प्राप्त करेंगे | समस्याएं 10 वर्षों में सुलझ जाएँगी | हमें अच्छे स्वायत्त संस्थानों की आवश्यकता है | उनमें से कुछ अच्छा कर रहे हैं लेकिन हमें उन्हें उनकी स्वतंत्रता देनी होगी | वे संकुचित हैं, सरकार उन्हें बहुत कम पैसे देती है और उनके पास सीमित स्वतंत्रता है | इसलिए मुझे लगता है कि कार्य की स्वतंत्रता के लिए अभी हमें शिक्षा में सुधार की आवश्यकता है | आप भारत में स्टैनफोर्ड चाहते हैं, तो हमें सुधार की आवश्यकता है | सबसे बड़ा सुधार शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों को पूर्ण प्रशासनिक, शैक्षिक, और वित्तीय अधिकार और शक्ति प्रदान करना है | वित्त पोषण के मामले में उन्हें प्रदर्शन के मानदंड के आधार पर प्रति छात्र वित्त पोषण दिया जाना चाहिए | यदि प्रदर्शन तुच्छ है तो फंडिंग काटा जाना चाहिए | यदि आवश्यक हो तो संकाय को नौकरी से जाने दीजिये और छात्र कहीं और जा सकते हैं | परन्तु दण्ड और उत्तरदायित्व की आवश्यकता है | आज सार्वजनिक क्षेत्र में या सरकारी नौकरी मिलना पहले दिन से ही पेंशन प्राप्त करने जैसा है | आप किसी भी बात के लिए उत्तरदायी नहीं हैं और लगभग किसी को भी कभी निकाला नहीं जाता है | 25 से, जब कोई व्यक्ति आरम्भ करता है, 60 वर्ष तक, जब वह सेवानिवृत्त होता है और सभवतः 85 तक जब वह मरता है, सार्वजनिक करदाताओं के धन का उपयोग उसके वेतन और पेंशन की भुगतान के लिए होता है | क्योंकि उत्तरदायित्व कहां है ? यह एक प्रकार से गंभीर बात है कि स्वतंत्रता के 70 वर्षों के बाद भी हमने अंग्रेजी शैली की लोकसेवाओं को समाप्त नहीं किया है | और एक अधिक मुफ्त बाजार या निजीकृत मॉडल की ओर कदम बढाया है | – राजीव देखें यह सार्वजनिक या निजी की बात नहीं बल्कि परिणाम की बात है | हमें सार्वजनिक, निजी, अर्ध-सार्वजनिक, सार्वजनिक-निजी जैसे निरर्थक पहचानों में नहीं उलझना चाहिए, और इसके स्थान पर परिणाम पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए | क्या ये संस्थान, सार्वजनिक या निजी, वांछित परिणाम दे रहे हैं ? यदि नहीं, तो उन्हें उत्तरदायी ठहराना चाहिए | यदि वे दोषपूर्ण हैं, तो उन्हें बंद करें | उदाहरण के लिए एयर इंडिया दोषपूर्ण है, चाहे वह सार्वजनिक या निजी हो | इसमें पैसा क्यों डालना ? सरकार के रूप में, वे संरक्षित हैं जैसे कि वे पवित्र गाय हों | हमारे करदाताओं के धन का उपयोग हमारे प्रतिनिधियों द्वारा दोषपूर्ण संस्था को जीवित रखने में हो रहा है | क्योंकि वे सोचते हैं कि वे सत्ता में आए हैं, इसलिए उन्हें इन संस्थानों को जीवित रखना है | हमारे प्रतिनिधि हमारे पैसे का उपयोग करते हैं और हमारे प्रति उत्तरदायित्व से मुक्त रहते हैं | मैंने कहीं और ऐसा विकृत तर्क नहीं देखा है | हमें अधिक लोकतंत्र और स्वतंत्रता चाहिए और सरकार को अपना काम करना चाहिए | राजीव, शास्त्रीय राजनीतिक सिद्धांत के अनुसार, सरकार को देश की बाहरी सीमाओं की रक्षा करनी चाहिए | आंतरिक विधि और व्यवस्था बनाए रखना, नागरिकों को न्याय देना, मुद्रा का प्रबंधन करना और विदेशी देशों के साथ संबंध बनाए रखना | उनकी 5 भूमिकाएं हैं | बाहरी सीमाएं देखें तो हम अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं लेकिन पाकिस्तान से आतंकवादी आते रहते हैं | आंतरिक कानून और व्यवस्था, हमारे पास पर्याप्त पुलिसकर्मी नहीं हैं और सुरक्षा पर्याप्त नहीं है | यह हिस्सा विफल है | कोई न्याय नहीं है, लोगों को 15-16 वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है | कुछ उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश संयम का प्रयोग करने और न्याय पर ध्यान केंद्रित करने के स्थान पर क्रिकेट व अन्य संगठनों को चलाना चाहते हैं | मुद्रानुसार हमने अच्छा किया है | विमुद्रीकरण ने अच्छी तरह से प्रणाली को स्वच्छ किया | विदेशी नीति में, पहले हमारे पड़ोसी हमसे घृणा करते थे | आज विश्व हमारा सम्मान करता है | अब सरकार को अपना काम करना चाहिए और कोयला या इस्पात मंत्रालय नहीं चलाना चाहिए या शिक्षा प्रदाता नहीं बनना चाहिए | सेवा किसी के द्वारा प्रदान की जा सकती है | यदि कुछ लोग अक्षम हैं तो सरकार को उन्हें सीधे भुगतान करना चाहिए | राजीव, दरिद्रता सामान्यतः क्रय शक्ति की कमी है | जिसके पास अधिक है, वो समृद्ध है, और जिसके पास नहीं, वो निर्धन | आप मुझे क्रय शक्ति दें, और मैं अपने लिए स्वयं निर्णय लूँगा, अपने बच्चों को शिक्षित करूँगा, अपना घर बनाऊंगा और जिस प्रकार चाहूँ, जियूँगा | क्रय-शक्ति के बिना मैं असहाय हूँ | क्योंकि मैं असहाय हूँ, सरकार कहती है कि मैं आपको ये सब दूँगी | और मैं निचले स्तर के अधिकारी की दया पर हूँ जो देश का सबसे बड़ा आततायी है और मुझे भिखारी बनाकर छोड़ा है | इन सभी सेवाओं को चलाने के स्थान पर, अन्य लोगों को उन्हें प्रदान करने दें, और यदि मेरे पास क्रय की शक्ति है, तो मैं विविध प्रदाताओं के पास जा सकता हूँ | चूँकि मेरे पास क्रय-शक्ति नहीं है, इसलिए जब मैं सरकार के पास जाता हूँ तो वे मुझे सताते हैं और मुझे भिखारी होने का अनुभव कराते हैं | वे मेरे विश्वास, मेरे व्यक्तित्व और मेरी नागरिक की पहचान को नष्ट कर देते हैं | यह पूरी तरह से अलोकतांत्रिक और अनसुना है | हमें विरोध करना है और कहना है कि सरकार लोगों से बनी है और एक नागरिक के रूप में मैं भी महत्वपूर्ण हूँ | इसके स्थान पर भ्रम है और हमारे बौद्धिक इन वास्तविक विषयों पर बहस नहीं करते हैं | और अधिक रोचक जानकारी आ रही है | अगले खंड में मोहनदास पाई संस्कृति और आर्थिक सशक्तिकरण के बीच के संबंधों को समझाएंगे |

100 thoughts on “Youth Issues. Mohandas Pai’s Game-Changing Ideas on Education, Employment and Public Policy.”

  1. Every second each and every Indian is paying, not only the SINS of nehru but also congress party.

  2. talk about agriculture, farmers, whom are poorest of poor and their childrens education first. Are you talking about India or just urban population? Privatisation of education keeping poor out of business.
    2/3 of India still depends on agriculture. Know what agriculture is going through. Average income of a farming family in 20 states is 20K pet year and today private education costs lakhs and crore. wake up..

  3. Bang on sir! Wish people like you could influence where India heads. Bureaucracy has largely turned into a useless system that is impeding India's progress. Media and intelligentsia have completed the evil triangle.

  4. It's been life changing event for a NRI like me to know about you. Watched your videos, as you advised joined a organization (balgogokulam) with seva attitude. Attend weekly shaka with my family. Doing my karma. Kids becoming proud hindus. Dhanyavad

  5. You cannot start a school even if you are a linguistic minority, that easily. You can apply for the minority board for approval, but the board members who are sitting in the minority commission or whatever is just religious minorities and not linguistic minorities. So a hindu cannot escape even that. Hindus are treated as 2nd class citizens in India. They cannot own both their educational institutions and religious institutions.

  6. Make job policies …Let the villagers stay in the villages..They should be helped to set up farming based industeries…whose products should be exported…Then they will earn much and not move to cities….This way less people in the cities,,less vehicles on roads,,pollution control…

  7. I am surprised that Mohandas Pai did not mention anything about education in mother tongue. At top universities education will be in local language/mother tongue. S.Korea, Japan, China, Germany, France, Israel, US, Finland, Norway etc. the quality of education will improve only when higher education in India will be available in local indian languages. For an average indian, getting a good hold on english itself will take many years. Each indian state should provide education in states's language. There is no need for a common language for india. Just like how EU works without a common language, india can also do.

  8. lot of interesting points but I feel that Pai is ignoring population jihad in north India which is at least 1 reason for the population increase, not just lack of female education. In south also it is ongoing but there christian conversions are more and they aren't doing population jihad yet. The data should be seen religion wise otherwise it's baseless. I think it would be very interesting to study this whole thing on the basis of religion. for instance what are Hindus doing what are Muslims doing and what are Christians doing. if one group of people are determined to increase the population what can the govt do? no matter how much the government invests, the rising Muslim population will eat it all up.

  9. Mohandas Pai is a true Data nerd and an honest intellectual with a vision but not a communist or left oriented. He makes the right points and has doable solutions. Pleasure to listen to him and also encouraging to do good things. Mohandas ji please keep doing this again and again and inspire us . Thanks Rajiv ji for bringing this talk.

  10. For something good to happen, people in power must work to earn it. Its time to eradicate the current education minister and replace with people with the Halwai touch

  11. While I understand it's importance, the understanding of birth rates is only understood by the rural and city HINDU public. Amongst the Muslims, consciously there is a very hard stand against birth control – both due to majority of Maulvis and the interpretation of Quran that exists. This trend will further and further ruin the demographics of India until it's impossible to really call this a Hindu / Dharmic civilisation. Be protectionist and strictly apply the birth control education amongst the minority, if not, then DO NOT do anything at all. Either way, what I'm saying is – ensure balance.

  12. thanks sir , it is very informative video . we doo feels same issues about aur education system , and now we get words to express them .

  13. People do not want to talk about the state of humanities and social sciences Departments in Indian Universities. These Departments have become the camps of hate preachers against Indian Democracy!

  14. Sonia’s Right to Education was about the worst thing to happen because private schools had to close down if they did not have a playing field and other such very stringent rules.

  15. Hello,
    There's a point I'd like to add here having studied in the United States. In the higher education system here, there's a lot of stress on grassroot level skill development. I've seen students here who are very inclined towards learning new stuff and helping the society which I (generally) don't see in the Indian URBAN youth. The US has youth ranging from electricians, plumbers and people working on mechanics and machines since grade 9 because they have to fend for themselves and they do this work with utmost diligence. Remember, most of these guys belong to normal middle class backgrounds. This is a fact that needs to be stressed on by the Indian society as a whole and I believe Modi has selected the right path by talking about skill development.

  16. Fully agree with observations of Mohandas Pai. I came to USA after B.Tech. and here I realized that govt job (HR) is to provide basic education (up to 12th grade) to everyone to make them employable in technically advance society but not to subsidize so much college and university education but make educational loan easy. Due to lack of long term vision and understanding, Nehru (not to be too critical) focused on putting money in higher education but not on basic education.

    In USA, most professors act as independent educated businessman bringing research money and job is not guaranteed like India. Most professors bring more research money than their annual salary and they hire graduate student from soft money and hence, research topic has connection with industry. A professor of Neurology may be earning 5 times of a professor of humanities in same university because salary is decided on the basis of market value of your skills. Hence, academic keep moving to industry and vice-versa. Surprise, most famous American universities (Ivy Leagues) are private and they have huge endowment funds … so much to write on this topic.

    Since 1947, every govt blamed population for every misery, poverty etc. in India. First time, Modi portrayed that weakness into strength that younger working population and trying to develop skill. I can guarantee if all muslim girls get up to 12th grade education in regular school or develop marketable skill, their rate of population growth will go down.

  17. Mr Mohandas ji you have an excellent analytical mind
    Two issues: one no research in india- here it's problem of plenty and in US everything is commercial and if they want any product to be marketed the use the research method and pump in the market( eg about cholesterol issue)
    In India u you are right that there is no accountability
    Instead of giving importantance to financial budget we should do HRD budget public and analyse the target and achievement gap

  18. Don't compare human behaviour of US youth with that of Indian whereas we have strong family ties
    Family accepts responsibility of growing up a child
    Whereas in US independence sets in younger days and they have to earn and learn and many do not do high level education and earn early and enjoy

  19. Watched all four parts of the interview! Very intriguing, Absolutely relevant & data driven. Thanks & Congratulations Rajiv Malhotra and T.V Mohandas Pai for such lucid presentation- bringing the facts on the table and exposing the lies! Can't think of any other such interview /discussion on real matters done so well! 🙂

  20. Rajiv ji .. i dont agree with population getting related to education because we are like refugee place for the world. We have immigrants who become citizens once they enter country and due course become anti nationals. Moreover so called minorities get all facilities, jobs, money and wht not. So they keep breeding. On the contrary hindu population has only gone down.

  21. immediately steps shud b taken to curb the population of muslims ……
    but hindus cant afford to reproduce less than 2 children …… otherwise they will b extinct in India ……
    no hindus in hindustan ….. lol.
    and yes to sustain this huge hindu population no doubt the big and real issue is the employment .

  22. In Tamil Nadu, they are opposing every industry govt is bringing and wants people to be jobless, water problem so they can blame BJP and bring congress back. also one more main problem is only Hindus are having one or two children and not Christian and Muslims. Especially Muslims have three wives and have ten children from each each wife. They preach this among their community in mosques. They have a movement called which translates "Rebel Tamil nadu". They are opposing, Neet exam, GST, Sagar mala, Nutrino, Koodangulam nuclear power plant, every thing that the govt brings.Youngsters of T.Nadu are brainwashed as Tamils are not Hindus. Celebrities only support Missionaries and Muslims knowingly they are wrong.

  23. The christian missionary have hijacked our education because of the law that forbids Hindus we can not create as many schools as these missionaries who are directly benefiting from this unjust law. please take in to account that this law could have been framed uniquely to favor these missioanries

  24. when you want savage uncontrolled "development " , pollution is inevitable ; industrialists should pay for the wastage they create if they reject their smoke, drainage or wastage unfiltered and if no inspectors visit them à l'improviste and punish them, they will continue damaging our health . In France, they have a law called "pollueur payeur" that is those who p)pollute pay and equip filtering machines etc

  25. https://www.hindupost.in/media/runs-funds-hinduphobic-anti-bharat-media-like-wire/

    This guy also connected in funding anti-India portals like The Wire ?

  26. Regarding the population thing Mr. Pai is saying, it’s a valid point that he is saying education may help in controlling the population.

    But has he researched “other” reasons behind population increase ?

    Has he looked into the religious demography which is changing rapidly day by day ?

    Is the increase in numbers of certain groups who can’t be named proportionate or grossly disproportionate? Is it a pattern to outbreed the infidels ?

    What has happened to the infidel populations in villages/districts where the infidels have been outnumbered by eskimos ?

  27. Mr Mohandas Pai always rocks the debate /interview. H e is one of the few speakers who has complete grasp of data on the subject.

  28. A separate show dedicated to Indian population is much needed. INDIA is sitting on a population time bomb and no government is doing anything about it !!

  29. This channel ( https://www.youtube.com/watch?v=biwy-jQdipI ) also working on the same path and spreading knowldge about Sh. Rajiv Malhotra's work

  30. अगर जात करम से बचचे को training दी जाती है। तो बेरोजगार की समभावना 100 '/,तक safe zone मे रहता है। example कोई अग्रवाल परिवार वयापार कर रहा है। तो बच्चे के job security बनी रहती है। आज एक चायवाले भी नौकरी वाले को कमाने मे chalenge करता है।लेकिन human haresment होने से new population काम से हट जाता है।

  31. एक नाई का परिवार कई पिढी से नाई का काम कर ये काम तो कभी बंद नही होगा। मेने देखा है। मनुषय को जनम से ही करम निर्धारित है।। उसको वास्तविक शिक्षा की आवश्यकता है। और जिनके पुरानेकाम tecnology की वजह से खत्म हो गये उसे पूनजिवित करने की जरूरत है।

  32. इनसान के पलायनवाद को रोकना होगा। ईससे फायदा ये है। शहरी जनसंख्या मे कमी आएगी।

  33. The debate about intolerance is real in the context of the party in power tacitly & directly " supporting / justifying " criminals who indulge in lynchings ( muzaffarnagar ) & rapes ( Jammu & unnao ) .

  34. More than anything else, the " Modi – fied " Media aka " godi – media " indulge in sensational issues / Hindu-muslim hyperbolic debates , as it suits Modi , because then the public discourse doesn't analyse the " delivery of #AchheDin " .

  35. Staying in bengaluru but the blunder what karnataka people saw in election was so horrible. Even after getting 104 . Dacaits + Theives made the government.

  36. An excellent discussion, accompanied by pertinent data to underscore the issues and solutions. Jobs, Education, and Environment (JEE) ought to be the priorities of every country. Environment pertains both to nature and citizens. It includes issues such as National Security, Law and Order and Justice. The focus on these priorities will drive all initiatives for a country to progress. The need for jobs extends from short term to long term. Education pays medium to long term dividends. Quality of education can be enhanced dramatically by using technology, such as MOOCS and distance learning. IITs are mentioned and the following is an opinion on Mission IIT: https://deshbandhu.blogspot.com/2011/10/mission-iit.html

  37. Congress including Nehru did not put enough emphasize on education because they realized that illiterate and poor people are their vote banks. So why educate them. They will keep voting for you and Congress can stay in power and keep getting rich with power and bribe.

  38. Good information. But holding Nehru responsible for the things isn't right for everything cannot be expected to be perfect, flaws come with benefits too in the constitution. Also think about the age it was, could this be imagined then which is happening today in our country.

  39. Sad thing is indian youths following educated moron who mocks modi always sitting at germany, dhruv has almost 800k subscribers, while rajiv malhotraji doing very well job but still underrated 😞

  40. Rajiv Sir, this is one of the best informative and educative interaction. These kind of discussion must happen in like minded channel. So more people can understand the things which are good for the nation.. thanks

  41. The Professors recruited at esteemed institutes like IIT also have to be through merit rather than personal preferences of higher authorities. Also their advancement in terms of knowledge must be kept in check through the term if they are really performing their duty or merely satisfying ego among their students, only trying to hold on to their money wending positions!

  42. I wish Mohandas, Dr. Swamy should be inducted in the next ministry and remove the persons who are root cause for many setbacks for Mr. Modi. More than half of the ministers are fit to be removed and depts to be closed down as they are big drain of exchequer.

  43. Mr.Pai…👍👍👍, very very clear interpretation of the the situation and the remedies for most of the situation we are in . Hope the Law makers take this narrative and implement this verbatim to take our Nation to greater heights…

  44. Government doesn't look at & analyse data !!! Modiji pitaa ki bhaantee act karein !! Media won't act fairly since its under foreign church control.

  45. Our IITs and IIMs are white elephants. Our hard-earned money extracted as many forms of taxes goes in subsidizing the study, stay, food of these institutes. Then what! Most of the pass-outs leave India!! Those who cannot go out, get into white color govt. jobs are indulge in large-scale corruptions!! Why should we raise up these idiots??

  46. One of the biggest problems is, our media, the 4th estate of the Democratic set-up – PRESS – has foreign ownership. How can we expect decent reporting?

  47. This conversation is relatable in the fact that the Nehruvian mentality is evident among people when u see someone blaming gov. for every petty evil happening in the society. Rather than taking a stand for such issues, such people want gov. to do everything for them. Nehru literally ran India as if he was the Maharaja of independent India and we all are his praja, thereby making people virtually useless.

  48. I hope people realize Nehru ruled for 17 years of the 70 years. Everything is not Nehru's fault. Its like absolving our sins by bathing in the Ganges.

  49. We need a law to ban fake news without adequate proof and jail people who spread the fake news. Singapore has recently made laws against such news.

  50. Nehru could only think of affording pedestrian grade scholars out of the mostly primitive institutions and some excellent special purpose institutions. This is understandable at a time when the British left us as poor, undeveloped and survival was the worry for many. One can't blame Nehru for whatever did not happen. However his siblings who inherited the mantle did not have the vision to better the system and get some world class universities in due course.They became busy filling their pockets and their friends' pockets!. We still remain pedestrian and the time has come to change the statues-quo. Minimum schooling should be made compulsory for both genders!

  51. Sir, very informative discussion. Request you post these kind of videos not only in English and Hindi but also in all major regional languages like Tamil, Telegu, Kannada and Malayalam etc so that it will reach more rural people.

  52. 5 : 56 Im totally against this view. Yes taught well but not in Schools or Universities but purely by big belly money eating COACHING CENTRES

  53. Earlier, Pakistan quoted Quint, Karan Thapar & Praveen Swami to prove Kulbhushan a RAW spy at International Court of Justice (ICJ) .

    Now, Pakistan Media & Pak PM Imran Khan's Political Party is sharing video clip of NDTV show to prove that Indians are unhappy & India can face riots due to abolition of Article 370.

    This is our Media.

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